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15 जून- आज ही अमृतसर में गौ कत्लखाने पर धावा बोल कर पराक्रमी सरदारों ने मुक्त कराये थे सैकड़ों गौ वं

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ये वो जंग थी जिसको तथाकथित इतिहासकारों और नकली कलमकारों ने लिखना तो दूर संज्ञान लेना भी उचित नहीं समझा . उनकी चाटुकारिता यकीनन आड़े आ रही थी .. कूका विद्रोह आज के समय में शायद ही ज्यादा लोग बता पायें लेकिन ये थी वो जंग जो देश और धर्म दोनों को ध्यान में रख कर लड़ी गई थी .. बहुत छोटी सी संख्या ले कर सरदारों ने इस जंग में हिला कर रख दिया था खुद को अजेय समझने वाले अंग्रेजो को और मजबूर कर दिया था उन्हें पीछे हटने पर . आईये जानते हैं कि आखिर क्या था वो कूका विद्रोह जिन्हें हिला कर रख दिया था ब्रिटिश सत्ता को लेकिन उसके बाद भी नहीं पाया भारत के इतिहास में उचित मान और सम्मान .. 


जब देश में आये थे तो उनको यह नहीं पता था कि भारत में बहादुर लोग भी धर्म और जाति के आधार पर जाने जाते हैं. पहले अंग्रेजों को यह लगता था कि राजपूत लोग ही सेना में होते हैं और वह देश के लिए लड़ते हैं. अब इंग्लैंड में तो सेना के अन्दर होना, मात्र धन कमाने का एक साधन था लेकिन भारत में ऐसा नहीं था.

सतगुरु राम सिंह ने विश्व में पहली बार शांतिमय आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए सहयोग संवेदनशील आंदोलन का आगाज किया। जब अंग्रेजों ने धर्म के नाम पर लोगों को लड़ने व गुलामी का अहसास करवाने के लिए पंजाब में जगह-जगह गौ वध के लिए बूचड़खाने खोले, तब नामधारी सिखों ने इसका बड़ा विरोध किया व सौ नामधारी सिखों ने आज ही के दिन अर्थात 15 जून 1871 को अमृतसर व 15 जुलाई 1871 को रायकोट बूचड़खाने पर धावा बोल कर गायों को मुक्त करवाया।

इस बगावत के जुर्म में 5 अगस्त 1871 को तीन नामधारी सिक्खों को रायकोट, 15 दिसम्बर 1871 को चार नामधारी सिखों को अमृतसर व दो नाम धारी सिखों को 26 नवम्बर 1871 को लुधियाना में बट के वृक्ष से बांधकर सरेआम फांसी देकर शहीद कर दिया गया।


Source: ( http://www.sudarshannews.com ) 




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